सवाल पूछती 'Gen-Z' और चरमराता शिक्षा तंत्र: हक मांगने वाला युवा 'दिमागी नक्सल' कैसे हो गया?
आज का भारत दुनिया का सबसे युवा देश कहलाता है। यह वह पीढ़ी है (Gen-Z और मिलेनियल्स), जो अपने सुनहरे भविष्य, रोजगार और आत्मसम्मान के लिए दिन-रात लाइब्रेरी के छोटे से कमरों में किताबों से जूझ रही है। लेकिन जब यही युवा सिस्टम की कमियों पर सवाल उठाता है, पेपर लीक के खिलाफ आवाज बुलंद करता है या बंद होते सरकारी स्कूलों पर बात करता है, तो उसे समाधान के बदले 'वैचारिक उग्रवादी' या 'दिमागी नक्सल' जैसे लेबल्स थमा दिए जाते हैं।
लोकतंत्र में बुनियादी सवाल यह है—क्या परीक्षा में पारदर्शिता और बेहतर शिक्षा की मांग करना अपराध है?
1. पेपर लीक का अंतहीन सिलसिला: NEET से लेकर राज्य परीक्षाओं तक
देश के युवाओं की सबसे बड़ी निराशा का कारण लगातार हो रहे पेपर लीक और रद्द होती परीक्षाएं हैं:
- NEET और NTA की साख पर सवाल: लाखों छात्र और उनके अभिभावक अपने जीवन की गाढ़ी कमाई और कई साल NEET जैसी मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी में झोंक देते हैं। जब ऐसे राष्ट्रीय स्तर के एग्जाम में धांधली और पेपर लीक की खबरें आती हैं, तो छात्रों का भरोसा टूट जाता है।
- करियर का संकट: केवल केंद्रीय परीक्षाएं ही नहीं, बल्कि विभिन्न राज्यों की सिपाही भर्ती, शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET), पटवारी और राज्य लोक सेवा आयोगों की परीक्षाओं में अनियमितताओं से युवाओं का भविष्य अधर में लटक जाता है।
- सालों की मेहनत पर पानी: परीक्षाओं का रद्द होना या वर्षों तक कोर्ट में खिंचना युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य और मनोबल को बुरी तरह प्रभावित करता है।
2. सरकारी शिक्षा का सिमटता दायरा: 10 साल में 94,000+ स्कूल कम
सरकारी शिक्षा के बुनियादी ढांचे के आधिकारिक आंकड़े (UDISE+) एक गंभीर स्थिति दर्शाते हैं:
- स्कूलों का बंद/मर्ज होना: पिछले एक दशक के दौरान देश भर में लगभग 94,000 सरकारी स्कूल कंसोलिडेशन या कम छात्र संख्या के कारण बंद या मर्ज किए गए हैं।
- निजीकरण का दबाव: इसी अवधि में 40,000 से अधिक नए निजी स्कूल खुले हैं। सरकारी स्कूलों में पर्याप्त शिक्षकों और सुविधाओं के अभाव में अभिभावक निजी विकल्पों पर निर्भर होने को मजबूर हैं।
- ड्रॉपआउट की आशंका: दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों में प्राथमिक स्कूल बंद होने से गरीब और वंचित वर्ग के बच्चों, विशेषकर बालिकाओं, की शिक्षा पर असर पड़ता है।
3. 'Gen-Z' युवा: अधिकार मांगने वाला नागरिक या 'दिमागी नक्सल'?
जब परीक्षाओं में गड़बड़ी और रोजगार की कमी के चलते युवा सड़कों पर या डिजिटल माध्यमों पर अपनी बात रखते हैं, तो उन्हें अक्सर राजनीतिक ध्रुवीकरण और कठोर शब्दों का सामना करना पड़ता है:
- असहमति पर लेबल: सिस्टम की जवाबदेही तय करने की मांग को 'अर्बन नक्सल' या 'दिमागी नक्सल' बताकर मुख्य मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश की जाती है।
- संवैधानिक अधिकार: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 हर नागरिक को शांतिपूर्ण ढंग से अपनी अभिव्यक्ति और असहमति दर्ज कराने का अधिकार देता है।
- युवाओं की वास्तविक मांग: आम युवा किसी हिंसक विचार का समर्थन नहीं करता; उसकी मांग केवल पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया, समय पर परिणाम और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व्यवस्था है।
सुधार की आवश्यकता: संवाद और नीतिगत समाधान
- सख्त कानून का प्रभावी क्रियान्वयन: भर्ती परीक्षाओं में धांधली रोकने के लिए बने कानूनों को कड़ाई से लागू किया जाए।
- सार्वजनिक शिक्षा में सुधार: स्कूलों को बंद करने के स्थान पर उनमें आधुनिक तकनीक और नियमित शिक्षकों की नियुक्ति सुनिश्चित की जाए।
- लोकतांत्रिक संवाद: युवाओं की चिंताओं को सुरक्षा खतरे के रूप में देखने के बजाय उनसे सीधा और पारदर्शी संवाद स्थापित किया जाए।
"लोकतंत्र में नागरिकों द्वारा सवाल पूछना व्यवस्था को मजबूत बनाने की प्रक्रिया का हिस्सा है।"
